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पानी चुनावी मुद्दा क्यों नहीं? ( हिन्दुस्तान )            शशि शेखर

1.      यहां नदी की धार इतनी साफ है कि नीचे तैरती मछलियां तक स्पष्ट दिखती हैं। वे खासी निडर हैं, क्योंकि कोई उन्हें चोट नहीं पहुंचाता। यदि आप पैदल चलकर नदी पार करना चाहें, तो वे हौले से किनारे सरककर आपको रास्ता दे देती हैं शशि शेखर ( chief editor हिन्दुस्तान )

2.      मछलियां जल को साफ करती हैं, जबकि इंसान गंदा करता है शशि शेखर chief editor हिन्दुस्तान

3.      क्षीण होती पयस्विनी, मंदाकिनी के लिए शुभ संकेत नहीं, क्योंकि सहायक नदियां हमेशा अपने से बड़ी नदियों को बलवान बनाती आई हैं शशि शेखर ( chief editor हिन्दुस्तान )

4.      पूर्वजों की  लापरवाही या कुदरती कारणों से सरस्वती सूखी थी, आज पयस्विनी आखिरी सांसें ले रही है शशि शेखर ( chief editor हिन्दुस्तान )

5.      कल क्या गंगा और यमुना का यही हश्र होना है शशि शेखर ( chief editor हिन्दुस्तान )

6.      गंगा-यमुना के मायके उत्तराखंड से लेकर उनके द्वारा रचे गए विशाल दोआब में लोगों के हलक प्यास से सूखे जा रहे हैं। वहां गांव के गांव निर्जन हो रहे हैं, क्योंकि पीने का पानी नहीं है और जलाभाव से फसलें सूख रही हैं शशि शेखर ( chief editor हिन्दुस्तान )

7.      मंदाकिनी चाहे बुंदेलखंड की हो या उत्तराखंड की, काल दोनों पर मंडरा रहा है। उत्तराखंड में भी कई ताल (छोटी झीलें) और जलस्रोत सूख चुके हैं। टिहरी जिले में चंदीयार, कांडा और अंधियार ताल अतीत बन चुके हैं। रुद्रप्रयाग में चौराबाड़ी ताल भी सूखने के कगार पर है। यह मंदाकिनी नदी का उद्गम स्थल है। इसी तरह, बागेश्वर में भागीरथी गधेरा, बिलौना, कफौली, छिड़गंगा और काफलीबैंड के झरने सूख चुके हैं। अल्मोड़ा में चंद्रेश्वर नौला सूख गया है शशि शेखर ( chief editor हिन्दुस्तान )

8.      पिछले साल राज्यसभा में तत्कालीन पेयजल और स्वच्छता राज्य मंत्री रामकृपाल यादव ने एक सवाल के जवाब में बताया था कि देश के 308 जिले पेयजल की भीषण किल्लत से जूझ रहे हैं शशि शेखर ( chief editor हिन्दुस्तान )

9.      बांदा जनपद में पिछले साल 33,000 चापाकलों में से 35 % सूखे शशि शेखर ( chief editor हिन्दुस्तान )

10.  अब हिमालय की गोद में बसे दूसरे सूबे मणिपुर पर आते हैं। यहां हर साल 1,500 मिलीमीटर बारिश होती है, पर उसके संरक्षण और वितरण की कोई माकूल व्यवस्था अभी तक विकसित नहीं की गई। यहां के अधिकांश लोग पानी माफिया पर निर्भर हैं। नतीजतन, 1000 लीटर जल के लिए 200 रुपये तक चुकाने पड़ते हैं शशि शेखर ( chief editor हिन्दुस्तान )

11.  कभी सुमेरु और सिंधु घाटी की सभ्यताओं की तूती बोला करती थी। आज वे अतीत का हिस्सा बन गई हैं। तकनीक के इस जमाने में क्या हमारे हुक्मरानों ( politicians & officers ) को इस ओर ध्यान नहीं देना चाहिए ? शशि शेखर ( chief editor हिन्दुस्तान )


पिछले दिनों हम चित्रकूट के पास मंदाकिनी के उद्गम स्थल पर खडे़ थे। अद्भुत दृश्य था। सामने विंध्य पर्वतमाला की तली से उतावली जलधार निकलकर कुदरती ढलान पर पसरती जा रही थी। हजारों साल से इस बहाव ने बुंदेलखंड की पवित्र-पावन नदी मंदाकिनी को सदानीरा बना रखा है। बाहर से आए श्रद्धालुओं के लिए यहमां अनुसुइयाका स्मृति प्रतीक है, जबकि स्थानीय लोगों के लिए जीवन-रेखा।
यहां नदी की धार इतनी साफ है कि नीचे तैरती मछलियां तक स्पष्ट दिखती हैं। वे खासी निडर हैं, क्योंकि कोई उन्हें चोट नहीं पहुंचाता। यदि आप पैदल चलकर नदी पार करना चाहें, तो वे हौले से किनारे सरककर आपको रास्ता दे देती हैं। कोई श्रद्धालु खाने की सामग्री उनकी ओर उछालता है, तो वे बाल सुलभ मुद्रा में उसकी ओर लपकती हैं। तली पर आराम फरमा रहे उनके संगी-साथियों को भी जाने कैसे खबर हो जाती है, वे भी अचानक प्रकट हो जाते हैं। नन्ही मछलियों का यह झुंड महानगरीय जिंदगी की सारी थकान दूर कर देता है।
मैं 1983 में पहली बार यहां आया था। भयानक गरमी के बावजूद उन दिनों नदी में जल ज्यादा था। हर ओर शांति पसरी पड़ी थी। आज कमोबेश भीड़ बढ़ी है, पर शुक्र है अशांति के हालात अभी तक नहीं हैं। वजह? यातायात के साधनों का अभाव और इस इलाके के डाकू गिरोह। पर्यटकों की तादाद में समय के साथ जो थोड़ी-बहुत बढ़ोतरी हुई है, उसकी वजह से तट पर तमाम दुकानें और झुग्गियां उग गई हैं। देखकर दुख हुआ कि बीयर की केन, पानी की बोतलें, तमाम तरह के खाद्य पदार्थों के खाली पैकेट, सडे़ हुए खाद्यान्न, फटे-चीथडे़ कपडे़ और मानवीय मल यहां की खूबसूरती को दाग लगाने पर आमादा हैं।
मछलियां जल को साफ करती हैं, जबकि इंसान गंदा करता है
पर मंदाकिनी छीज रही है, इसका प्रमाण चित्रकूट पहुंचते ही मिल जाता है। वहां के पंडे बताते हैं कि यह पयस्विनी और विलुप्त सरस्वती का संगम है। किधर है पयस्विनी, पूछने पर एक क्षीण नाले की ओर इशारा कर दिया गया। क्षीण होती पयस्विनी, मंदाकिनी के लिए शुभ संकेत नहीं, क्योंकि सहायक नदियां हमेशा अपने से बड़ी नदियों को बलवान बनाती आई हैं सवाल उठता है, क्या ये दोनों सरस्वती के हश्र को हासिल हो रही हैं? सरस्वती भले विलुप्त हो गई हो, मगर हमारी कथाओं में यह नदी कभी मरी नहीं। इलाहाबाद में प्रचलित किंवदंतियां इसे त्रिवेणी की अंतरधारा बताती हैं। सैकड़ों साल से यह नदी हिंदू जनमानस की आस्था पर काबिज है। वे सारे लोग, जो धार्मिक होने का दावा करते हैं, उनके ध्यान में यह क्यों नहीं आता कि पूर्वजों की लापरवाही या कुदरती कारणों से सरस्वती सूखी थी, आज पयस्विनी आखिरी सांसें ले रही है
कल क्या गंगा और यमुना का यही हश्र होना है ?
मैं बनारस में पैदा हुआ, मिर्जापुर और इलाहाबाद में पला-बढ़ा। मैंने भी जवाहरलाल नेहरू की तरह गंगा-यमुना को विविध रूपों में देखा है। अब जब कभी मथुरा में यमुना पुल से गुजरता हूं, तो नीचे देखकर आह निकल जाती है। कृष्ण के बृज को रचने वाली यमुना अब प्रदूषित जल का प्रवाह बन गई। इटावा में चंबल और हमीरपुर में बेतवा अपनी खुदी को इसमें मिलाकर उसे पुनर्जीवन देती हैं। इसी तरह, इलाहाबाद में यमुना के संगम से पहले गंगा को देखिए। कलेजा मुंह को जाएगा। यही वजह है कि उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के सघन चुनावी दौरे के दौरान मुझे हर जगह लोग पीने के पानी का रोना रोते नजर आए। गंगा-यमुना के मायके उत्तराखंड से लेकर उनके द्वारा रचे गए विशाल दोआब में लोगों के हलक प्यास से सूखे जा रहे हैं। वहां गांव के गांव निर्जन हो रहे हैं, क्योंकि पीने का पानी नहीं है और जलाभाव से फसलें सूख रही हैं। ऊपर से रोजगार के नए अवसर पैदा नहीं हो रहे
उत्तराखंड में भी कई ताल (छोटी झीलें) और जलस्रोत सूख चुके हैं। टिहरी जिले में चंदीयार, कांडा और अंधियार ताल अतीत बन चुके हैं। रुद्रप्रयाग में चौराबाड़ी ताल भी सूखने के कगार पर है। यह मंदाकिनी नदी का उद्गम स्थल है। मंदाकिनी चाहे बुंदेलखंड की हो या उत्तराखंड की, काल दोनों पर मंडरा रहा है। इसी तरह, बागेश्वर में भागीरथी गधेरा, बिलौना, कफौली, छिड़गंगा और काफलीबैंड के झरने सूख चुके हैं। अल्मोड़ा में चंद्रेश्वर नौला सूख गया है नैनीताल जिले के सातताल क्षेत्र में डोब, कमल और सूखा ताल भी जल के अभाव में अपनी आब खो चुके हैं।
हालात कितने भयावह हैं, यह इसी से जाहिर हो जाता है कि पिछले साल राज्यसभा में तत्कालीन पेयजल और स्वच्छता राज्य मंत्री रामकृपाल यादव ने एक सवाल के जवाब में बताया था कि देश के 308 जिले पेयजल की भीषण किल्लत से जूझ रहे हैं इनमें से अकेले उत्तर प्रदेश के 50 जिले शामिल हैं। एक आरटीआई के जवाब में उत्तर प्रदेश सरकार ने चार साल पहले कुबूला था कि 10 वर्षों के दौरान सिर्फ बुंदेलखंड में 4,020 जल स्रोतों का वजूद खत्म हो गया। बांदा जनपद में पिछले साल 33,000 चापाकलों में से 35 % सूखे
यहां के पाठा इलाके का एक लोकगीत इस भयावहता को विस्तार देता है- ‘गगरी फूटे चाहे खसम मर जाए।
इसी तरह, उत्तराखंड में एक एनजीओ ने पिछले साल जून में अपनी रिपोर्ट जारी की थी। उसके अनुसार, राज्य के 60 हजार जलस्रोतों में से 12 हजार सूख चुके हैं। राज्य के तत्कालीन मुख्य सचिव का मानना था कि इस पहाड़ी प्रदेश से पलायन का सबसे बड़ा कारण पेयजल का अभाव है।
अब हिमालय की गोद में बसे दूसरे सूबे मणिपुर पर आते हैं। यहां हर साल 1,500 मिलीमीटर बारिश होती है, पर उसके संरक्षण और वितरण की कोई माकूल व्यवस्था अभी तक विकसित नहीं की गई। यहां के अधिकांश लोग पानी माफिया पर निर्भर हैं। नतीजतन, 1000 लीटर जल के लिए 200 रुपये तक चुकाने पड़ते हैं इस मामले में पंजाब थोड़ा बेहतर साबित हुआ। यमुना-सतलुज नहर के बहाने ही सही, चुनाव के दौरान कम से कम पानी पर बहस तो हुई। बाकी चार राज्यों में कोई दल इस मुद्दे पर गंभीरता से कुछ नहीं बोला।
बात सिर्फ इन प्रदेशों की नहीं है। यह दर्दनाक स्थिति आप कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक कहीं भी देख सकते हैं। कहीं यह हमारी सभ्यता के पराभव का संकेत तो नहीं है? कभी सुमेरु और सिंधु घाटी की सभ्यताओं की तूती बोला करती थी। आज वे अतीत का हिस्सा बन गई हैं। तकनीक के इस जमाने में क्या हमारे हुक्मरानों को इस ओर ध्यान नहीं देना चाहिए? प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सत्ता में आते ही नदियों को जोड़ने की बात कही थी, मगर उस पर अभी तक कोई असरकारी कदम नहीं उठाए गए हैं।
ये चुनाव एक अवसर थे, जब जीवन के लिए जरूरी इस तत्व पर सभी दल अपना एजेंडा पेश करते, लेकिन सिर्फ दलों के दलदल को और गंदा करने वाले नारे उछाले गए। पुरानी भारतीय कहावत है- ‘पानी पिला-पिलाकर मारा।हमारे नेता तो हमें बेपानी मार रहे हैं
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1.       मंडी में आलू को कोई भाव नहीं मिल रहा है, जिसके चलते जिले के किसानों को तीन लाख टन आलू कोल्ड में ही छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा है
2.       750 बोरी उन्होंने कोल्ड स्टोर में रखवा दीं । जबकि 500 बोरी आलू का भंडारण उन्होंने देसी तरीके से अपने घर पर ही किया, जिससे कोल्ड का किराया बच गया
3.       जो आलू मंडी में पांच से छह रुपये किलो बिक रहा था उसे उन्होंने आठ से नौ रुपये किलो की दर पर बेचा
कीमत में लगातार गिरावट के जिस दौर में जिले के हजारों किसान अपना तीन लाख मीट्रिक टन से अधिक आलू कोल्ड स्टोरेज में ही छोड़ने को मजबूर हैं, उसमें भी इस किसान ने अच्छा खासा मुनाफा कमाकर दूसरे किसानों के लिए रास्ता खोल दिया है। खेती में उनका अर्थशास्त्र मिसाल बन गया है उनके पास बिक्री के लिए एक बोरी आलू भी नहीं बचा है।
इस साल आलू की बंपर पैदावार होने और मांग घटने से सब्जियों के राजा की जो बेकद्री हुई है, वह किसी से छिपी नहीं है। मंडी में आलू को कोई भाव नहीं मिल रहा है, जिसके चलते जिले के किसानों को तीन लाख टन आलू कोल्ड में ही छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा है उन्हें लाखों का नुकसान हुआ है, लेकिन नगला राधे के किसान लोकेश कुमार इस मंदी में भी खुश नजर आते हैं। अर्थशास्त्र से परास्नातक करने वाले लोकेश की उम्र अभी महज 34 साल है, लेकिन खेती के अर्थशास्त्र में सबसे आगे निकलते दिखाई दे रहे हैं।
पिछले साल उन्होंने दो हैक्टेयर खेत में आलू बोया था। इसमें 1250 बोरा आलू का उत्पादन किया। इसमें से 750 बोरी उन्होंने कोल्ड स्टोर में रखवा दीं । जबकि 500 बोरी आलू का भंडारण उन्होंने देसी तरीके से अपने घर पर ही किया, जिससे कोल्ड का किराया बच गया बाद में इसे नौ सौ रुपये प्रति कुंतल की दर से मुंबई की मंडी में बेच दिया। अन्य किसानों की तरह लोकेश को भी इस बात का इंतजार था कि जब मांग बढ़ेगी तो वह कोल्ड स्टोर में रखा आलू निकालकर अच्छे दामों में बेचेंगे, लेकिन इस साल आलू का रेट बढ़ा ही नहीं, बल्कि उसमें लगातार गिरावट आती रही।
अब स्थिति ये है कि नया आलू बाजार में गया है और पुराना आलू अब भी कोल्ड में पड़ा है, लेकिन आलू की इस बेकद्री का लोकेश पर कोई असर नहीं पड़ा। उन्होंने बाजार का मूड पहले ही भांप लिया था। उद्यान विभाग द्वार आलू निकासी की चेतावनी को भी उन्होंने गंभीरता से लिया। मंडी और बाजार में कोई भी लागत मूल्य पर भी आलू लेने को तैयार नहीं था, जबकि फुटकर में आलू 9 से 10 रुपये प्रति किलो की दर से बिक रहा था। इससे साफ था कि पूरा मुनाफा बिचौलिया और दुकानदार कमा रहे थे। लोकेश ने किसान और उपभोक्ता के बीच में से इन दोनों को निकालने का फैसला किया।
इसके बाद उन्होंने अपनी कार को ही चलती फिरती दुकान बना लिया। घर में आलू के दो-दो, पांच-पांच और 10-10 किलो आलू के पैकेट तैयार किए। ग्राहकों के मन में कोई संदेह रहे इसके लिए उन्होंने एक इलेक्ट्रोनिक कांटा भी इन पैकेट के साथ कार में रख लिए। इसके बाद उन्होंने जगह जगह जाकर आलू की बिक्री की। उनका जो आलू मंडी में पांच से छह रुपये किलो बिक रहा था उसे उन्होंने आठ से नौ रुपये किलो की दर पर बेचा
प्रशासन को भी पंसद आया तरीका
आलू की बिक्री करने का लोकेश का तरीका प्रशासन को भी पसंद आया। जिला उद्यान विभाग की पहल पर लोकेश ने अपनी चलती फिरती दुकान कई दिन तक विकास भवन के बाहर भी लगाई। यहां विकास भवन के साथ ही कलक्ट्रेट और पुलिस लाइन के अधिकारी कर्मचारियों ने भी उनसे आलू खरीदा।
बागवानी बोर्ड भी रहा कायल
लोकेश खेती के अर्थशास्त्र में काफी आगे निकल चुके हैं। राष्ट्रीय बागवानी बोर्ड भी उनका कायल है। 2012 में जब आलू को ट्रेन से मुंबई की मंडी में भेजने की योजना पर काम हुआ तो लोकेश ही जिले के एकमात्र किसान थे, जिन्होंने फीरोजाबाद से दो कंटेनर आलू ट्रेन से मुंबई भेजा। इस पर बोर्ड ने उन्हें मुंबई तक आने जाने के लिए हवाई जहाज के टिकट मुफ्त में भेजे। लोकेश ने बताया कि जिले में पहला सोलर पंप भी उन्होंने ही लगवाया है। वह आज भी खेत की ¨सचाई सोलर पंप से करते हैं।
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तीन घंटे में 12 एकड़ में छिड़काव

1.    मजदूर द्वारा छिड़काव करवाते थे तो इसके लिए एक से दो दिन लग जाते थे, जिसे ड्राेन के जरिए मात्र तीन घंटे में हो गया
2.    एक अनुमान के मुताबिक एक एकड़ में हाथ से छिड़काव करने पर 100 लीटर पानी लगता है, जबकि ड्रोन से 20 लीटर पानी लगता है

किसान संदीप सिंह तोमर ने बताया कि मैंने 12 एकड़ में ड्रोन के जरिए कीटनाशक का छिड़काव करवाया है। इसके पहले जब हम इतने ही एकड़ में मजदूर द्वारा छिड़काव करवाते थे तो इसके लिए एक से दो दिन लग जाते थे, जिसे ड्राेन के जरिए मात्र तीन घंटे में हो गया तोमर की माने तो ड्रोन से छिड़काव प्रॉपर तरीके से होता है। एक अनुमान के मुताबिक एक एकड़ में हाथ से छिड़काव करने पर 100 लीटर पानी लगता है, जबकि ड्रोन से 20 लीटर पानी लगता है। अलग-अलग कंपनियों के कीटनाशक की मात्रा अलग-अलग होती है, लेकिन एक आंकड़ा निकाले तो एक एकड़ में 100 ग्राम दवाई का लगती है।

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तोमर ने बताया कि इस ड्रोन में आठ लीटर घोल की क्षमता वाली टंकी लगी है। जर्मन टेक्नोलाॅजी के इस ड्रोन में अलग-अलग से में बने पार्ट लगे हैं। कंपनी अपने इस प्रोजेक्ट के तहत अब तक क्षेत्र में 300 एकड़ में छिड़काव कर चुकी है। इनका टारगेट है कि निमाड़ में करीब डेढ़ हजार एकड़ तक पहुंचा जाए।
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18 December 2017
New marketing plans to increase percentage of profit for a manufacturer                 
                      Dealers and distributors share a huge percentage of profit in any product. This plan aims to increase percentage of profit for a manufacturer and reduce the role of dealers & distributors. To achieve this objective a manufacturer can directly do marketing and sales of product. If a manufacturer directly does distribution then profit percentage of manufacturer increases.
How to achieve this objective ?
                   Manufacturers can start online sales of products just like that done by e-commerce companies e.g. Amazon, Flipkart etc. Transport companies can be hired to deliver product at the doorstep of customer and retailer. To further reduce the cost of transportation; product can be transported over long distances by Rail freight transport & then over short distances by road. Rail freight transport is cheaper than road transport. 
                     E.g. if product from a plant in Madhya Pradesh ( state of India ) has to be sold in Andhra Pradesh  ( state of India ) then product can be transported from plant to some major railway stations of Andhra Pradesh by Rail freight transport and then over the rest of Andhra Pradesh it can be transported by road. Furthermore, since product is being sold directly by plant, so even if maximum retail price (MRP) is reduced a little bit as compared to its initial value even then also plant will have a higher percentage of profit. Lower MRP will attract more customers.
Advantages of this plan
1.      Increase in percentage of profit for the manufacturer.
2.      Increase in number of customers.
3.      Customers and retailers can get product at a lower price.
SHANTANU AGRAWAL Email-id agrrshantanu@gmail.com
Mobile & WhatsApp numbers +918889684336, +919919234299
गाय को हर महीने ये 14 चीजें थोड़ा सा खिलाइए

1
तुलसी
2
पुदीना
3
नीम
4
अजवाइन
5
मीठा नीम पत्ता 
6
दालचीनी
7
धनिया
8
राई
9
अदरक
10
करेला
11
मंगरैल
12
इलायची
13
खीरा
14
ककड़ी
उत्तर बिहार में तकरीबन 50,000 hectare क्षेत्र में सिंचित स्थिति में नारियल की खेती की जा सकती है
देश में नारियल की खेती को बढ़ावा देने के लिए बनाए गए नारियल विकास बोर्ड के सहयोग से बिहार-बंगाल के साथ ही असम, त्रिपुरा, मिजोरम और नागालैंड में नारियल की खेती के प्रति किसानों का रूझान बढ़ रहा है    बिहार में नारियल से जुड़ी योजनाओं को लागू करने के लिए 2014 से लेकर अबतक 409.06 लाख रुपए नारियल विकास बोर्ड की तरफ से जारी किया गया है उत्तर बिहार का कोसी क्षेत्र जिसमें कोसी नदी के दोनों तरफ के इलाके आते हैं, नारियल की खेती के लिए उपयुक्त है अनुमान है कि बिहार में विशेषकर उत्तर बिहार में तकरीबन 50,000 hectare क्षेत्र में सिंचित स्थिति में नारियल की खेती की जा सकती है
यह भी पढ़ें- सेहत की रसोई: याददाश्त बेहतर बनाने के लिए खाएं खोपरा पाक या नारियल पाक (copy, paste & search याददाश्त बेहतर बनाने के लिए खाएं खोपरा पाक या नारियल पाक on google)

1.    Scientists at BARC, National Research Centre on Litchi (www.nrclitchi.org ) succeed in treating litchi and preserving it for 60 days.

2.    Mutation breeding, or variation breeding is process of exposing seeds to chemicals or radiation to generate mutants with desirable traits.

3.    BARC develops high yielding seed varieties by inducing mutations using Gamma radiation.

4.    BARC has separate department for nuclear agriculture

5.    Bhabha Atomic Research Center (BARC) has developed 41 varieties of crops under its Nuclear Agriculture program till date.

there are few National institute of technical teachers training education and research. They provide post graduation COURSES in ENGINEERING information about their COURSES and different campuses all over India is available on their websites  I know these INSTITUTES in  Bhopal, Chandigarh, Kolkata. Defence ministry runs Defence INSTITUTE of advanced technology in Pune. It provides PhD and M. tech

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Reducing the number of students in coaching classes
SIR / MADAM,
         At present students and parents are under huge pressure because of coaching classes. The pressure is both financial and mental. Due to this kind of pressure more than 60 students committed suicide in past 6 years in Kota, the coaching hub of India. In general students of metropolitan cities leave home by 10 a.m. in morning for school, then go to coaching classes and finally return home by 9 p.m. This kind of horrible routine adversely effects health of students. Students commonly join coaching classes for examinations like engineering entrance, medical entrance, civil service examinations, MBA entrance, government banks etc.
           It is very strange that on one hand we talk about creating world class educational institutes and on the other hand we have a parallel or shadow education system of coaching classes.

I think few steps can be taken to reduce the number of students studying in coaching classes. Few suggestions in this direction are listed here:

1.      IIT can give solution of GATE, JEE mains & JEE advanced conducted since the year 2012 on website of JEE.
2.      Similarly IIM, AIIMS, UPSC, CBSE, state public service commissions, state education boards and government banks can also share questions and solution of written examinations conducted by them since the year 2012 on their websites.
3.      IIM, AIIMS, CBSE and IIT can give a List of book titles on their website to prepare for entrance examinations.
4.      UPSC, state public service commissions and government banks can also give a List of study material on their website to prepare for recruitment examinations.


If these steps are taken then dependency of students on coaching classes will decrease because they won’t need to join coaching class for getting the information that I have requested.
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प्रधान मंत्री उज्ज्वला योजना Pradhan Mantri Ujjwala Yojana ),  June 03, 2017            

  1. Liquefied petroleum gas ( LPG ) was distributed to people living
Below poverty line ( BPL ) in India through   प्रधान  मंत्री  उज्ज्वला  योजना 
( Pradhan Mantri Ujjwala Yojana ).
  1. Solar cookers can be distributed along with LPG under  प्रधान   मंत्री  उज्ज्वला  योजना  ( Pradhan Mantri Ujjwala Yojana ). 
  2.   Solar cookers can be used in summers or during day time.
  3. There is Lot of open space in villages   and solar cookers can be easily used in villages. 
  4. If solar cookers are used during summers or day time THEN Lot of LPG could have been saved.
  5. Use of solar cookers will also prevent pollution, global warming and our import bill of hydrocarbons.
  6. India imported LPG at 3.8 billion US Dollars ( Rs. 25,000 crore or 250 अरब  रुपया or 250 billion Indian rupees ) during 2015-16. If consumption of LPG is reduced 10 % in India by using solar cookers
THEN
 380 million US Dollars ( Rs 2,500 crore or 25 अरब  रुपया or 25 billion Indian rupees  ) can be saved every year.

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The great advocate HARISH SALVE saved income tax of 1.5 billion US DOLLARS ( 110 अरब  रुपया or 110 billion Indian rupees) for Vodafone in India. THIS incidence can inspire So many stories, novels, case studies, articles, TV SHOWS and movies. 

How to make foreign trip safer

1 save all documents on email id & google drive so that even if documents are lost THEN documents could be retrieved from email id or google drive.

2 learn language of the country you are travelling so that you can easily communicate with people of that country.

3 keep money in at-least 3 e-wallets & 3 bank accounts with facilities like forex card, mobile banking & net banking. Carry at-least 3 forex card.

4 save all contacts on email id so that even if phone is lost THEN contacts could be retrieved from email id.

5 save mobile number, email id & website of your hotel on your mobile phone & email id so that even if you miss location of your hotel then that hotel can be searched with these details saved on mobile phone & email id.

6 there should be a secret pocket in your pant or trouser, so that important things like mobile phone  & key of your room do not  get  misplaced.

7 eat simple & healthy food so that you do not suffer from health problems in foreign.

8 keep lees luggage so that you can easily manage your belongings.

9 wear light & simple clothes so that you are comfortable.

10 try to daily do little bit of jogging & exercise preferably in morning so that you have good health.

11 never carry more than 1 forex card IN YOUR purse. Keep other 2 ATM in your bag so that even if 1 forex card is lost THEN you can manage with other forex card that had been kept in bag.

12 apart from purse keep some money in other pockets &   some money in bag so that if purse is lost THEN all your money does not get lost with the purse.

13 find out contact details of embassy & consulate of your home country corresponding to your foreign country.  Save these contact details so that embassy or consulate of your home country could be contacted in case of emergency.

i did M.Tech in metallurgical engineering from IIT ( BHU ) in 2013

i have good presentation, writing skills &  knowledge.

i can help in better marketing with help of my these skills

you can see my writing skills on twitter &  blog https://twitter.com/shantanuagraw12 ,   http://shantanuthoughts.blogspot.in/

i have average knowledge of  MS Office




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